गुरु पूर्णिमा: गुरु की भक्ति में डूबे लोग... तस्मै श्रीगुरुवे नम:

गुरु पूर्णिमा: विश्वको सनातन धर्मकी एक अनमोल देन है ‘गुरु-शिष्य परंपरा’। संत गुलाबराव महाराजजीसे किसी पश्चिमी व्यक्तिने पूछा, ‘भारतकी ऐसी कौनसी विशेषता है, जो अल्पसे अल्प शब्दोंमें बताई जा सकती है?’ तब महाराजजीने कहा, ‘गुरु-शिष्य परंपरा’। इससे हमें इस परंपराका महत्त्व समझमें आता है। ऐसी परंपराके दर्शन करवानेवाला पर्व युगोंसे मनाया जाता है, और वह है, गुरुपूर्णिमा! हमारे जीवनमें गुरुका क्या स्थान है, इसका पाठ पढाती है गुरुपूर्णिमा । आजके इस विशेष लेखमें हम ‘गुरुपूर्णिमा’के बारेमें महत्त्वपूर्ण अध्यात्मशास्त्रीय जानकारी प्राप्त करेंगे ।



गुरुका महत्त्व: गुरुदेव वे हैं, जो साधना बताते हैं, साधना करवाते हैं और आनंदकी अनुभूति प्रदान करते हैं । गुरुका ध्यान शिष्यके भौतिक सुखकी ओर न होकर, केवल उसकी आध्यात्मिक उन्नतिपर होता है । गुरु ही शिष्यको साधना करनेके लिए प्रेरित करते हैं, चरण दर चरण साधना करवाते हैं, साधनामें उत्पन्न होनेवाली बाधाओंको दूर करते हैं, साधनामें टिकाए रखते हैं और मोक्षकी ओर ले जाते हैं । गुरुके संकल्पके बिना इतना बडा और कठिन शिव धनुष उठा पाना असंभव है । इसके विपरीत गुरुकी प्राप्ति हो जाए, तो यह कर पाना सुलभ हो जाता है । श्री गुरुगीतामें ‘गुरु’ संज्ञाकी उत्पत्तिका वर्णन इस प्रकार किया गया है

गुकारस्त्वन्धकारश्च रुकारस्तेज उच्यते ।
अज्ञानग्रासकं ब्रह्म गुरुरेव न संशयः ।। - श्री गुरुगीता

इसका अर्थ : ‘गु’ अर्थात अंधकार अथवा अज्ञान व ‘रु’ अर्थात तेज, प्रकाश अथवा ज्ञान। इस बातका कोई संशय नहीं कि, गुरु ही ब्रह्म हैं, जो अज्ञानके अंधकारको दूर करते हैं।
इससे ज्ञात होगा कि, साधकके जीवनमें गुरुका महत्त्व अनन्य है। इसलिए गुरुप्राप्ति ही साधकका पहला ध्येय है। गुरुप्राप्तिसे ही ईश्वरप्राप्ति होती है, या यूं कहें, कि गुरुप्राप्ति होना ही ईश्वरप्राप्ति है। ईश्वरप्राप्ति अर्थात मोक्ष-प्राप्ति। मोक्ष-प्राप्ति अर्थात निरंतर आनंदावस्था। गुरु हमें इस अवस्थातक पहुंचाते हैं । शिष्यको जीवनमुक्त करनेवाले गुरुके प्रति कृतज्ञता व्यक्त करनेके लिए गुरुपूर्णिमा मनायी जाती है।

गुरुपूर्णिमा दिनविशेष: आषाढ शुक्ल पूर्णिमाको गुरुपूर्णिमा एवं व्यासपूर्णिमा कहते हैं। गुरुपूर्णिमा गुरुपूजनका दिन है। गुरुपूर्णिमाका एक अनोखा महत्त्व भी है। अन्य दिनोंकी तुलनामें इस तिथिपर गुरुतत्त्व सहस्र (हजार) गुना अधिक कार्यरत होता है। इसलिए इस दिन किसी भी व्यक्तिद्वारा जो कुछ भी अपनी साधनाके रूपमें किया जाता है, उसका फल भी उसे सहस्र गुना अधिक प्राप्त होता है।

गुरुपूर्णिमाको ‘व्यासपूर्णिमा’ भी कहते हैं और गुरुपूर्णिमापर सर्वप्रथम व्यासपूजन किया जाता है।

एक वचन है – ‘व्यासोच्छिष्ठम् जगत् सर्वंम् ।’ इसका अर्थ है, विश्वका ऐसा कोई विषय नहीं, जो आदिगुरु महर्षि व्यासजीका उच्छिष्ट या जूठन नहीं है; अर्थात कोई भी विषय आदिगुरु महर्षि व्यासजीद्वारा अनछुआ नहीं है । आदिगुरु महर्षि व्यासजीने चार वेदोंका वर्गाrकरण किया। उन्होंने अठारह पुराण, महाभारत इत्यादि ग्रंथोंकी रचना की है ।

प्राचीन काल में जब विद्यार्थी गुरु के आश्रम में निःशुल्क शिक्षा ग्रहण करता था तो इसी दिन श्रद्धा भाव से प्रेरित होकर अपने गुरु का पूजन करके उन्हें अपनी शक्ति सामर्थ्यानुसार दक्षिणा अर्पण किया करते थे। इस दिन केवल गुरु ही नहीं, अपितु माता-पिता, बड़े भाई-बहन आदि को भी गुरुतुल्य समझना चाहिए और उनकी पूजा करनी चाहिए ।

इस दिन प्रातः घर की सफाई, स्नानादि नित्य कर्म से निवृत्त हो जाएँ और शुद्ध वस्त्र धारण करें और अपने घर से गुरु आश्रम जाकर गुरु की प्रसन्नता के लिए अन्न, वस्त्र और द्रव्य से उनका पूजन करे । उसके उपरान्त ही उन्हें धर्म ग्रन्थ, वेद, शास्त्र तथा अन्य विद्याओं की जानकारी और शिक्षण का प्रशिक्षण मिल पाता था । इस प्रकार श्रद्धा पूर्वक पूजन करने से गुरु का आशीर्वाद प्राप्त होता है । गुरु को समर्पित इस पर्व से हमें भी शिक्षा लेते हुए हमें उनकी पूजा करनी चाहिए और उनके प्रति ह्रदय से श्रद्धा रखनी चाहिए । यह पर्व श्रद्धा से मनाना चाहिए, अंधविश्वासों के आधार पर नहीं। गुरु पूजन का मंत्र है -

गुरूर्ब्रह्मा गुरूर्विष्णु गुरूर्देवो महेश्वरः।
गुरुः साक्षात् परं ब्रह्म तस्मै श्री गुरवे नमः॥



व्यासपूर्णिमा कहती है कि तुम अपने भाग्य के आप विधाता हो, तुम अपने आनंद के स्रोत आप हो, सुख हर्ष देगा, दुःख शोक देगा लेकिन ये हर्ष-शोक आयेंगे-जायेंगे, तुम तुम्हारे आनंदस्वरूप को जगाओ और सब बौने हो जायेंगे। यह वह पूनम है जो हर जीव को अपने भगवत्स्वभाव में स्थिति करने में बड़ा सहयोग देती है।
जैसे बनिये के लिए हर दिवाली हिसाब-किताब और नया कदम आगे बढ़ाने के लिए है, ऐसे भी साधकों के लिए गुरुपूर्णिमा एक आध्यात्मिक हिसाब-किताब का दिवस है। पहले के वर्ष में सुख-दुःख में जितनी चोट लगती थी, अब उतनी नहीं लगनी चाहिए। पहले जितना समय देते थे नश्वर चीजों के लिए, उसे अब थोड़ा कम करके शाश्वत में शांति पायेंगे, शाश्वत का ज्ञान पायेंगे और शाश्वत 'मैं' को मैं मानेंगे, इस मरने वाले शरीर को मैं नहीं मानेंगे। दुःख आता है चला जाता है, सुख आता है चला जाता है, चिंता आती है चली जाती है, भय आता है चला जाता है लेकिन एक ऐसा तत्त्व है जो पहले था, अभी है और बाद में रहेगा, वह मैं कौन हूँ ?.... उस अपने 'मैं' को जाँचो तो आप पर इन लोफरों के थप्पड़ों का प्रभाव नहीं पड़ेगा। इनके सिर पर पैर रखकर मौत के पहले अमर आत्मा का साक्षात्कार हो जाय, इसी उद्देश्य से गुरू पूनम आती है।


गुरुपूर्णिमा उत्सव मनाने की पद्धति: सर्व संप्रदायों में गुरु पूर्णिमा उत्सव मनाया जाता है। यहां पर महत्त्वपूर्ण बात यह है कि, गुरु एक तत्त्व है। देह से भले ही भिन्न गुरु भिन्न दिखाई देते हों; परंतु गुरुतत्त्व तो एक ही है। संप्रदायों के साथ ही विविध संगठन तथा पाठशालाओं में भी गुरुपूर्णिमा महोत्सव श्रद्धापूर्वक मनाया जाता है। पूरे भारत में यह पर्व बड़ी श्रद्धा के साथ मनाया जाता है।

ऐसे करें गुरु पूजा: इस दिन (गुरु पूजा) प्रात:काल स्नान पूजा आदि नित्य कर्मों से निवृत्त होकर उत्तम और शुद्ध वस्त्र धारण कर गुरु के पास जाना चाहिए। उन्हें ऊंचे सुसज्जित आसन पर बैठाकर पुष्पमाला पहनानी चाहिए। इसके बाद वस्त्र, फल, फूल व माला अर्पण कर तथा धन भेंट करना चाहिए। इस प्रकार श्रद्धापूर्वक पूजन करने से गुरु का आशीर्वाद प्राप्त होता है।

गुरु के आशीर्वाद से ही विद्यार्थी को विद्या आती है। उसके हृदय का अज्ञानता का अन्धकार दूर होता है। गुरु का आशीर्वाद ही प्राणी मात्र के लिए कल्याणकारी, ज्ञानवर्धक और मंगल करने वाला होता है। संसार की संपूर्ण विद्याएं गुरु की कृपा से ही प्राप्त होती हैं और गुरु के आशीर्वाद से ही दी हुई विद्या सिद्ध और सफल होती है। इस पर्व को श्रद्धापूर्वक मनाना चाहिए, अंधविश्वासों के आधार पर नहीं।

गुरु पूजन का मन्त्र है-
'गुरु ब्रह्मा गुरुर्विष्णु: गुरुदेव महेश्वर:।'
गुरु साक्षात्परब्रह्म तस्मैश्री गुरुवे नम:।। 

आषाढ़ की पूर्णिमा को ही क्यों मनाते हैं ‘गुरु पूर्णिमा’


आषाढ़ पूर्णिमा को ‘गुरु पूर्णिमा’ के रूप में मानने का क्या राज है? धर्म जीवन को देखने का काव्यात्मक ढंग है। सारा धर्म एक महाकाव्य है। अगर यह तुम्हें खयाल में आए, तो आषाढ़ की पूर्णिमा बड़ी अर्थपूर्ण हो जाएगी। अन्यथा आषाढ़ में पूर्णिमा दिखाई भी न पड़ेगी। बादल घिरे होंगे, आकाश खुला न होगा।

और भी प्यारी पूर्णिमाएं हैं, शरद पूर्णिमा है, उसको क्यों नहीं चुन लिया? ज्यादा ठीक होता, ज्यादा मौजूं मालूम पड़ता। नहीं, लेकिन चुनने वालों का कोई खयाल है, कोई इशारा है। वह यह है कि गुरु तो है पूर्णिमा जैसा, और शिष्य है आषाढ़ जैसा। शरद पूर्णिमा का चांद तो सुंदर होता है, क्योंकि आकाश खाली है। वहां शिष्य है ही नहीं, गुरु अकेला है। आषाढ़ में सुंदर हो, तभी कुछ बात है, जहां गुरु बादलों जैसा घिरा हो शिष्यों से।

शिष्य सब तरह के हैं, जन्मों-जन्मों के अंधेरे को लेकर आ छाए हैं। वे अंधेरे बादल हैं, आषाढ़ का मौसम हैं। उसमें भी गुरु चांद की तरह चमक सके, उस अंधेरे से घिरे वातावरण में भी रोशनी पैदा कर सके, तो ही गुरु है। इसलिए आषाढ़ की पूर्णिमा! वह गुरु की तरफ भी इशारा है और उसमें शिष्य की तरफ भी इशारा है। और स्वभावत: दोनों का मिलन जहां हो, वहीं कोई सार्थकता है।

ध्यान रखना, अगर तुम्हें यह समझ में आ जाए काव्य-प्रतीक, तो तुम आषाढ़ की तरह हो, अंधेरे बादल हो। न मालूम कितनी कामनाओं और वासनाओं का जल तुममें भरा है, और न मालूम कितने जन्मों-जन्मों के संस्कार लेकर तुम चल रहे हो, तुम बोझिल हो। तुम्हारे अंधेरे से घिरे हृदय में रोशनी पहुंचानी है। इसलिए पूर्णिमा की जरूरत है!

चांद जब पूरा हो जाता है, तब उसकी एक शीतलता है। चांद को ही हमने गुरु के लिए चुना है। सूरज को चुन सकते थे, ज्यादा समीचीन होता, तथ्यगत होता, क्योंकि चांद के पास अपनी रोशनी नहीं है। इसे थोड़ा समझना होगा। चांद की रोशनी उधार है। सूरज के पास अपनी रोशनी है। चांद पर तो सूरज की रोशनी का प्रतिफलन होता है। जैसे कि तुम दीये को आईने के पास रख दो, तो आईने में से भी रोशनी आने लगती है। वह दीये की रोशनी का प्रतिफलन है, वापस लौटती रोशनी है। चांद तो केवल दर्पण का काम करता है, रोशनी सूरज की है।

हमने गुरु को सूरज कहा होता, तो बात ज्यादा दिव्य और गरिमापूर्ण लगती। और सूरज के पास प्रकाश भी विराट है। चांद के पास कोई बहुत बड़ा प्रकाश थोड़े ही है, बड़ा सीमित है। पर हमने सोचा है बहुत, सदियों तक, और तब हमने चांद को चुना है -दो कारणों से। एक, गुरु के पास भी रोशनी अपनी नहीं है, परमात्मा की है। वह केवल प्रतिफलन है। वह जो दे रहा है, अपना नहीं है, वह केवल निमित्त मात्र है, वह केवल दर्पण है।

तुम परमात्मा की तरफ सीधा नहीं देख पाते, सूरज की तरफ सीधे देखना भी बहुत मुश्किल है। प्रकाश की जगह आंखें अंधकार से भर जाएंगी। परमात्मा की तरफ भी सीधा देखना असंभव है। रोशनी ज्यादा है, बहुत ज्यादा है, तुम संभाल न पाओगे, असह्य हो जाएगी। तुम उसमें टूट जाओगे, खंडित हो जाओगे, विकसित न हो पाओगे।

इसलिए हमने सूरज की बात छोड़ दी। वह थोड़ा ज्यादा है, शिष्य की सामर्थ्य के बिल्कुल बाहर है। इसलिए हमने बीच में गुरु को लिया है।

गुरु एक दर्पण है, पकड़ता है सूरज की रोशनी और तुम्हें दे देता है। लेकिन इस देने में वह रोशनी को मधुर और सहनीय बना देता है। इस देने में रोशनी की त्वरा और तीव्रता समाप्त हो जाती है। दर्पण को पार करने में रोशनी का गुणधर्म बदल जाता है। सूरज इतना प्रखर है, चांद इतना मधुर है।

इसीलिए तो कबीर ने कहा है, गुरु गोविंद दोऊ खड़े काके लागूं पांय। किसके छुऊं पैर? वह घड़ी आ गई, जब दोनों सामने खड़े हैं। फिर कबीर ने गुरु के ही पैर छुए, क्योंकि बलिहारी गुरु आपकी, जो गोविंद दियो बताय।
गुरु पूर्णिमा: गुरु की भक्ति में डूबे लोग... तस्मै श्रीगुरुवे नम: गुरु पूर्णिमा: गुरु की भक्ति में डूबे लोग... तस्मै श्रीगुरुवे नम: Reviewed by Mukesh Mali on 7/03/2012 01:40:00 AM Rating: 5

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