
हिन्दू पंचांग के ज्येष्ठ माह की अमावस्या और पूर्णिमा (4 जून) को वट सावित्री व्रत रखा जाता है। इस दिन खासतौर पर स्त्रियों द्वारा वट यानी बरगद के पेड़ की पूजा की जाती है। जानिए आखिर वट पूजा परंपरा से जुड़े धार्मिक, वैज्ञानिक और व्यावहारिक पहलु क्या हैं -
धार्मिक दृष्टि से वटवृक्ष की जड़ में ब्रह्मदेव, मध्य भाग में भगवान विष्णु और अगले भाग यानी पत्ते और डालियों में भगवान शिव का वास और पूरे वृक्ष को सावित्री यानी सरस्वती का निवास स्थान माना जाता है। धार्मिक मान्यता है कि वट वृक्ष की पूजा लंबी आयु, सुख-समृद्धि और अखण्ड सौभाग्य देने के साथ ही हर तरह के कलह और संताप मिटाने वाली होती है। लेकिन इस व्रत के व्यावहारिक और वैज्ञानिक पहलू पर भी गौर करें तो इस व्रत की सार्थकता और ज्यादा साफ हो जाती है।
वट, बड़ या बरगद एक विशाल वृक्ष होता है, जो पर्यावरण की दृष्टि से एक प्रमुख वृक्ष है। क्योंकि इस वृक्ष पर अनेक जीवों और पक्षियों का जीवन निर्भर रहता है। हवा को शुद्ध करने और मानव की आवश्यकताओं की पूर्ति में भी वृक्ष की अहम भूमिका होती है। प्राचीन काल में मानव ईंधन और आर्थिक जरूरतों को पूरा करने के लिए लकड़ियों पर निर्भर रहता था। चूंकि बारिश का मौसम पेड़-पौधों के फलने-फूलने के लिए सबसे अच्छा समय होता है। वहीं इसी दौरान अनेक प्रकार के जहरीले जीव-जन्तु भी जंगल में घूमते हैं। इसलिए वर्षाकाल व उसके शुरू होने के कुछ वक्त पहले वृक्षों को कटाई से बचाने के साथ मानव जीवन की रक्षा के लिए भी ऐसे व्रत विधान धर्म के साथ जोड़े गए, ताकि ऐसे मौसम में वृक्ष भी फले-फूले और उनसे जुड़ी जरूरतों की अधिक समय तक पूर्ति होती रहे।
जानिए क्यों की जाती है वट वृक्ष की पूजा ...
Reviewed by Mukesh Mali
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6/17/2012 12:25:00 PM
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